जीवन भर के लिए
जीवन ठहरा हुआ
सागर नहीं,
गहरा कुँआ या कि
खाई नहीं,
और तालाब भी नहीं,
जो स्थिर रहता है,
सोता है।
जीवन तो झरना है
गिरता है
बहता है,
भर देता है प्राणों को
कण कण में।
जीवन तो नदी है,
नहीं रूकती तब तक
जब तक कि,
अपना सब कुछ
खो देती है।
जीवन तो बादल है,
जो भावों के जल से
कर देता है सराबोर,
संपूर्ण जगत को।
जीवन तो पवन है,
मलयगिरि से चलने वाला,
जो भर देता है मकरंद
फूलों में,
और भर देता है
सुगंध
जीवन भर के लिये
महक जाता है
जनमानस
युगों युगों तक।।
जीवन ठहरा हुआ
डॉ श्रवण(राज़)
05/09/2016
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