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Friday, May 12, 2017

💔😒किसान की ज़ुबानी परिवार की कहानी 💔:

💔😒किसान की ज़ुबानी परिवार की कहानी 💔:-
  😞😞😞😞😞😞😞😞😞

कहते हैं..
इन्सान सपना देखता है
तो वो ज़रूर पूरा होता है.
मगर
किसान के सपने
कभी पूरे नहीं होते
बड़े अरमान और कड़ी मेहनत से फसल तैयार करता है और जब तैयार हुई फसल को बेचने मंडी जाता है.
बड़ा खुश होते हुए जाता है.
बच्चों से कहता है
आज तुम्हारे लिये नये कपड़े लाऊंगा फल और मिठाई भी लाऊंगा,
पत्नी से कहता है..
तुम्हारी साड़ी भी कितनी पुरानी हो गई है फटने भी लगी है आज एक साड़ी नई लेता आऊंगा.
😞😞😞😞😞
पत्नी:–”अरे नही जी..!”
“ये तो अभी ठीक है..!”
“आप तो अपने लिये
जूते ही लेते आना कितने पुराने हो गये हैं और फट भी तो गये हैं..!”
जब
किसान मंडी पहुँचता है .
ये उसकी मजबूरी है
वो अपने माल की कीमत खुद नहीं लगा पाता.
व्यापारी
उसके माल की कीमत
अपने हिसाब से तय करते हैं.
एक
साबुन की टिकिया पर भी उसकी कीमत लिखी होती है.
एक
माचिस की डिब्बी पर भी उसकी कीमत लिखी होती है.
लेकिन किसान
अपने माल की कीमत खु़द नहीं कर पाता .
खैर..
माल बिक जाता है,
लेकिन कीमत
उसकी सोच अनुरूप नहीं मिल पाती.
माल तौलाई के बाद
जब पेमेन्ट मिलता है.
वो सोचता है
इसमें से दवाई वाले को देना है, खाद वाले को देना है, मज़दूर को देना है ,
अरे हाँ,
बिजली का बिल
भी तो जमा करना है.
सारा हिसाब
लगाने के बाद कुछ बचता ही नहीं.
वो मायूस हो
घर लौट आता है
बच्चे उसे बाहर ही इन्तज़ार करते हुए मिल जाते हैं.
“पिताजी..! पिताजी..!” कहते हुये उससे लिपट जाते हैं और पूछते हैं:-
“हमारे नये कपडे़ नहीं ला़ये..?”
पिता:–”वो क्या है बेटा..,
कि बाजार में अच्छे कपडे़ मिले ही नहीं,
दुकानदार कह रहा था
इस बार दिवाली पर अच्छे कपडे़ आयेंगे तब ले लेंगे..!”
पत्नी समझ जाती है, फसल
कम भाव में बिकी है,
वो बच्चों को समझा कर बाहर भेज देती है.
पति:–”अरे हाँ..!”
“तुम्हारी साड़ी भी नहीं ला पाया..!”
पत्नी:–”कोई बात नहीं जी, हम बाद में ले लेंगे लेकिन आप अपने जूते तो ले आते..!”
पति:– “अरे वो तो मैं भूल ही गया..!”
पत्नी भी पति के साथ सालों से है पति का मायूस चेहरा और बात करने के तरीके से ही उसकी परेशानी समझ जाती है
लेकिन फिर भी पति को दिलासा देती है .
और अपनी नम आँखों को साड़ी के पल्लू से छिपाती रसोई की ओर चली जाती है.
फिर अगले दिन
सुबह पूरा परिवार एक नयी उम्मीद ,
एक नई आशा एक नये सपने के साथ नई फसल की तैयारी के लिये जुट जाता है.
….
ये कहानी
हर छोटे और मध्यम किसान की ज़िन्दगी में हर साल दोहराई जाती है
…..
हम ये नहीं कहते
कि हर बार फसल के
सही दाम नहीं मिलते,
लेकिन
जब भी कभी दाम बढ़ें, मीडिया वाले कैमरा ले के मंडी पहुच जाते हैं और खबर को दिन में दस दस बार दिखाते हैं.
कैमरे के सामने शहरी महिलायें हाथ में बास्केट ले कर अपना मेकअप ठीक करती मुस्कराती हुई कहती हैं..
सब्जी के दाम बहुत बढ़ गये हैं हमारी रसोई का बजट ही बिगड़ गया.
………
कभी अपने बास्केट को कोने में रख कर किसी खेत में जा कर किसान की हालत तो देखिये.
वो किस तरह
फसल को पानी देता है.
१५ लीटर दवाई से भरी हुई टंकी पीठ पर लाद कर छिङ़काव करता है,
२० किलो खाद की
तगाड़ी उठा कर खेतों में घूम-घूम कर फसल को खाद देता है.
अघोषित बिजली कटौती के चलते रात-रात भर बिजली चालू होने के इन्तज़ार में जागता है.
चिलचिलाती धूप में
सिर का पसीना पैर तक बहाता है.
ज़हरीले जन्तुओं
का डर होते भी
खेतों में नंगे पैर घूमता है.
……
जिस दिन
ये वास्तविकता
आप अपनी आँखों से
देख लेंगे, उस दिन आपके
किचन में रखी हुई सब्ज़ी, प्याज़, गेहूँ, चावल, दाल, फल, मसाले, दूध
सब सस्ते लगने लगेंगे.
Please Send to your all groups
तभी तो आप भी एक मज़दूर और किसान का दर्द समझ सकेंगे।
आगे सैंड ज़रूर करो
आपसे अनुरोध है
"जय जवान जय किसान"

Monday, October 3, 2016

वसूली, vasuli,


वीरभद्र और नारायण गाँव के बीच में स्थित चबूतरे पर बैठकर गपशप कर रहे थे। इतने में चमन नामक आदमी  दौड़ा -दौड़ा वहां आया और कहा "नारायण जी, मुझपर आयी आपदा से आप ही मुझे बचा सकते हैं। मुझे अविलम्ब ही सौ अशर्फ़ियाँ चाहिए । दो -तीन महीने में ब्याज के साथ लौटा  दूँगा"। 
    " मुझे तुम्हारी ईमानदारी  कोई शक नहीं । फिर भी बात है पैसों की । अगर  तुम्हारी ईमानदारी की सिफ़ारिश गाँव का कोई प्रमुख करे , तो पैसों का इंतजाम हो जायेगा" ।  कहते हुए नारायण ने वीरभद्र की ओर देखा । 
    वीरभद्र ने तुरंत कहा "एक -दो  शायद देरी हो , किन्तु चमन अपने वादे का पक्का  है । जो रकम लेगा, वह अवश्य लौटाएगा । समझ लो , रकम तुम्हारी तिजोरी में महफ़ूज है ।"
    उसी दिन शाम को नारायण ने चमन को  सौ अशर्फ़ियां दी । 
    दूसरे दिन गली में  वीरभद्र और  नारायण का आमना -सामना हुआ , तो वीरभद्र ने नारायण से कहा "उस चमन के बारे में बहुत सावधान रहना । उसके पीछे -पीछे घूमते -घूमते तुम्हारे चप्पल घिस जायेंगे  वह इतनी आसानी से तुम्हारी रकम लौटाने वालों में से नही  है ।"
    " तो तुमने उसकी ईमानदारी के बारे में ऐसा क्यों कहा?" नारायण ने पूछा । 
    "करूँ भी क्या ? दो सालों के पहले उसे बीस अशर्फ़ियाँ दी थी। उन्हें वापस लेने के लिए मेरे पास और कोई चारा ना रहा । कल शाम को तुम्हारी दी हुयी अशर्फ़ियों को लेकर जैसे ही गली में आया, मैंने उसे पकड़ लिया और बीस अशर्फ़ियाँ मैं सूद सहित वसूल कर लिया।" कहता हुआ वीरभद्र आगे बढ़ गया। 


                                                                                                                      -सेतु माधव 

 

Saturday, September 3, 2016

काँच और हीरा glass and diamond



एक राजा का दरबार लगा हुआ था,क्योंकि सर्दी का दिन था इसलियेराजा का दरवार खुले मे लगा हुआ था.

पूरी आम सभा सुबह की धूप मे बैठी थी ..

महाराज के सिंहासन के सामने...एक शाही मेज थी...और उस पर कुछ कीमती चीजें रखी थीं.पंडित लोग, मंत्री और दीवान आदिसभी दरबार मे बैठे थेऔर राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे.. ..   उसी समय एक व्यक्ति आया और प्रवेश माँगा..प्रवेश मिल गया तो उसने कहा“मेरे पास दो वस्तुएं हैं,मै हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ औरअपनी वस्तुओं को रखता हूँ पर कोई परख नही पाता सब हार जाते हैऔर मै विजेता बनकर घूम रहा हूँ”..अब आपके नगर मे आया हूँ  राजा ने बुलाया और कहा “क्या वस्तु है”तो उसने दोनो वस्तुएं....उस कीमती मेज पर रख दीं..  वे दोनों वस्तुएं बिल्कुल समानआकार, समान रुप रंग, समानप्रकाश सब कुछ नख-शिख समान था.. … ..  राजा ने कहा ये दोनो वस्तुएं तो एक हैं.तो उस व्यक्ति ने कहा हाँ दिखाई तोएक सी ही देती है लेकिन हैं भिन्न. इनमें से एक है बहुत कीमती हीराऔर एक है काँच का टुकडा।  लेकिन रूप रंग सब एक है.कोई आज तक परख नही पाया क़िकौन सा हीरा है और कौन सा काँच का टुकड़ा.. कोइ परख कर बताये की....ये हीरा है और ये काँच..अगर परख खरी निकली...तो मैं हार जाऊंगा और..यह कीमती हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे जमा करवा दूंगा.  पर शर्त यह है क़ि यदि कोई नहींपहचान पाया तो इस हीरे की जोकीमत है उतनी धनराशि आपकोमुझे देनी होगी.. इसी प्रकार से मैं कई राज्यों से...जीतता आया हूँ..  राजा ने कहा मै तो नही परख सकूगा..दीवान बोले हम भी हिम्मत नही कर सकतेक्योंकि दोनो बिल्कुल समान है..सब हारे कोई हिम्मत नही जुटा पा रहा था.. .. हारने पर पैसे देने पडेगे...इसका कोई सवाल नही था,क्योंकि राजा के पास बहुत धन था,पर राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी,इसका सबको भय था..  कोई व्यक्ति पहचान नही पाया.. ..आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुईएक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा..उसने कहा मुझे महाराज के पास ले चलो...मैने सब बाते सुनी है...और यह भी सुना है कि....कोई परख नही पा रहा है...एक अवसर मुझे भी दो.. ..  एक आदमी के सहारे....वह राजा के पास पहुंचा..उसने राजा से प्रार्थना की...मै तो जनम से अंधा हू....फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये..जिससे मै भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ..और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊं.. और यदि सफल न भी हुआ...तो वैसे भी आप तो हारे ही है..  राजा को लगा कि.....इसे अवसर देने मे क्या हर्ज है...राजा ने कहा क़ि ठीक है..तो तब उस अंधे आदमी को...दोनो चीजे छुआ दी गयी.. और पूछा गया.....इसमे कौन सा हीरा है....और कौन सा काँच….?? ..यही तुम्हें परखना है.. ..  कथा कहती है कि....उस आदमी ने एक क्षण मे कह दिया कि यह हीरा है और यह काँच.. ..  जो आदमी इतने राज्यो को जीतकर आया थावह नतमस्तक हो गया..और बोला....“सही है आपने पहचान लिया.. धन्य हो आप…अपने वचन के मुताबिक.....यह हीरा.....मै आपके राज्य की तिजोरी मे दे रहा हूँ ” .. सब बहुत खुश हो गयेऔर जो आदमी आया था वह भीबहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कमकोई तो मिला परखने वाला..  उस आदमी, राजा और अन्य सभीलोगो ने उस अंधे व्यक्ति से एक हीजिज्ञासा जताई कि तुमने यह कैसेपहचाना कि यह हीरा है और वह काँच.. ..  उस अंधे ने कहा की सीधी सी बात है मालिकधूप मे हम सब बैठे है.. मैने दोनो को छुआ ..जो ठंडा रहा वह हीरा.....जो गरम हो गया वह काँच.....

जीवन मे भी देखना.....
जो बात बात मे गरम हो जाये, उलझ जाये...
वह व्यक्ति "काँच" हैं
और
जो विपरीत परिस्थिति मे भी ठंडा रहे.....
वह व्यक्ति "हीरा" है..!!

Sunday, August 7, 2016

नागपंचमी पर गुड़िया पीटने का रहस्य की कहानियाँ (Tales of Mystery Dolls banging on Nag Panchami)


इस परम्परा के पीछे क्या है गुड़िया पीटने का अनोखा रहस्य, इसके पीछे का रहस्य इस्त्रियों से जुड़ा हुआ है। हम ये कहानियाँ बड़े बुजुर्गों के मुँह से कभी न कभी जरूर सुने होंगे।

कहानी (1) 

किसी नगर में एक खुशहाल परिवार में भाई -बहन रहते थे। दोनों में अत्यंत प्रेम था। भाई भोलेनाथ का परम भक्त था। वह हर सोमवार को भोलेनाथ के मन्दिर अवश्य जाता था।कुछ समय बाद उसे नाग देवता के दर्शन हुए। वह नाग देवता का दर्शन पाकर अत्यन्त ही प्रसन्न हुआ। प्रसन्नता में बहन को इस बारे में बताना ही भूल गया।

नाग दर्शन के बाद से तो वह हर रोज नागदेवता को दूध पिलाने लगा। अतः शनैः -शनैः दोनों एक दूसरे में अत्यंत प्रेम उत्पन्न हो गया। लड़का बिना नाग को दूध पिलाये एक अन्न दाना मुँह में नहीं डालता था, और नागदेवता भी लड़के को देख अपनी नागमणि छोड़ उसके पैर में लिपट जाता था।
इसी तरह दिन महीने बीतते गये, सावन का महीना आया तथा भाई -बहन मंदिर गये, हमेशा की तरह लड़के को देख नाग अपनी मणि छोड़ लड़के के पैर में लिपट गया, यह देख लड़की बहुत डर गयी, उसने सोचा कि मेरे भाई को साँप लिपटकर काट रहा है और भाई के मना करने के बावजूद भी। भाई की जान बचाने के लिए लड़की ने साँप को पीट -पीट कर मार डाला। 

इसके बाद जब भाई ने बहन को पूरी कहानी बतायी तो बहन जोर -जोर से रोने लगी और बोली इसकी सज़ा मुझे दो और मुझे भी मार डालो। परन्तु लोगों ने कहा कि ये गलती से हुआ है, इसलिए तुमको न मारकर कपड़े की गुड़िया बनाकर उसको पीटा जायेगा।
तब से नागपंचमी पर गुड़िया बनाकर उसको पीटने की परंपरा चली आ रही है।
कहानी (2)

किसी समय की बात है कि परीक्षित नाम के राजा की मौत तक्षक नाग के काटने से हुयी। बहुत समय बाद राजा परीक्षित की चौथी पीढ़ी के युवा और तक्षक नाग के चौथी पीढ़ी कन्या से विवाह हुआ।
(लड़कियों और औरतों के पेट में बहुत कम बात पचती है ) वह कन्या शादी कर ससुराल आयी। कुछ समय बाद कन्या ने अपनी सेविका से जिससे वह सखिवत व्यवहार करती थी वह अपना राज खोलते हुए बोली मैं तक्षक नाग की चौथी पीढ़ी की कन्या हूँ। परन्तु ये किसी से मत बोलना। परन्तु सेविका अनेको स्त्रियों से कह दी और ये बात धीरे -धीरे पुरे नगर में फैल गयी
तक्षक के राजा को इस बात से बहुत क्रोध आया और वह गुस्सा में नगर की सारी लड़कियों को चौराहे पर इकट्ठा कर कोड़ो से पिटवा -पिटवा कर मरवा दिया।
तभी से गुड़िया पीटने की परम्परा मनायी जाती है।

तक्षक नाग कौन ?

तक्षक आठ नागों में एक कश्यप का पुत्र तथा कद्रु के गर्भ से उत्पन्न हुआ था।  तक्षक का राजा परीक्षित को काटने का ये उद्देश्य था कि,  श्रृंगी ऋषि के श्राप से मुक्ति मिल सके। 
इन्हीं कारणों से पूरे संसार के साँपो का विनाश करने के लिए राजा जनमेजय ने क्रोधित होकर सर्प यज्ञ आरम्भ किया।  जनमेजय ने पहले ही अपने ऋषियों को आज्ञा दे दी थी कि,  तक्षक कहीं भी किसी के शरण में जाये और जो भी उसको शरण दे वो भी पाप का भागीदार होगा तथा तक्षक के साथ भस्म कर दिया जायेगा। तक्षक यह सब देख डर गया और भागते -भागते इन्द्र की शरण में पहुँचा। 
परन्तु ऋत्विको के मंत्र उच्चारण से तक्षक के साथ -साथ इन्द्र भी खीचते चले जा रहे थे। यह सब देख इन्द्र भय भयभीत होने लगे और तक्षक को उसके भाग्य भरोसे छोड़ भाग निकले। तक्षक ऋत्विक  मंत्रोच्चारण से अग्नि कुण्ड तक पहुँचा।  तब तक्षक के प्राण बचाने आस्तिक आये और उसके प्राण की जनमेजय से प्रार्थना की,  तब जाकर तक्षक के प्राण बचे। 
अरुणिमा 

Sunday, June 26, 2016

पंडित और यादव की कथा Pandit aur Yadav's ki Katha


यादव और यदवायिन [पति और पत्त्नी ] बहुत दिनों से कथा सुनने की इच्छा थी ।  एक दिन यादव अपनी पत्त्नी से बोले कि, अरे डब्बू की अम्मा सुनती हो ! जरा यह आओ, क्या है?  जब देखो तब गला फाड़ -फाड़ कर चिल्लाते रहते हो हमेशा अपनी ही सुनाते रहते हो, कभी मेरी भी सुने हो? इतने बरस शादी को हो गया..... हम भी जरा सुनना चाहते हैं कि कथा कैसे होती है, लेकिन नहीं, बस पूरी जिन्दगी इसी घर गृहस्थी में बीत जायेगा, कथा सुनने के नाम पर आँख, कान, मुँह, सब बन्द हो जाते हैं ।

अरे डब्बू के बाबू ऐसा ना करो की नरकौ में जगह न मिलै ( यादव के आवाज देते ही उनकी प्राण प्रिये के मुख से एक ही में सांस में इतने मधुर वाक्य निकल पड़े)।

" यादव खटिया [चारपाई ] पर बैठे -बैठे मुस्कुराते हुए " थोड़ी देर जरा हमारी भी तो सुन लीजिए !

ठीक है बोलो ? लेकिन आज हम कुछ नही जानते, हम आपसे बताय दे रहे हैं, ऊ....... जो कथा होती है, हमको सुनना है ।

इतनी देर से कथा के बारे में बात करना चाह रहे है और तुम हो की हमें बोलने का मौका ही नहीं दे रही हो ,

क्या....? आप कथा के बारे में बात कर रहे हैं ? अच्छा -अच्छा ठीक है, कब और कैसे करना है ?

मैं आज ही पंडित जी से सारी विधियाँ पूछकर आऊंगा और कल सुबह हम लोग कथा सुनेंगे [ यादव जी तो कभी कथा -वथा ना सुने थे ना ही देखे थे ] दूसरे दिन सुबह - सुबह यदवायिन बड़े जोर-शोर से तैयारियाँ कर रही थी । जहाँ कथा होनी थी वह वहाँ पर गोबर से लीप दी थी और वहाँ पर केले का पत्ता, पान, सुपाड़ी, जल, पूजा की सारी सामग्री रख दी गयी थी ।

अब पण्डित जी आये, यादव यदवायिन दोनों लोग नहा धुलकर नए वस्त्र धारण करके बैठ गए । पण्डित जी से यादव जी बोले, पण्डित जी हमने कभी कथा नहीं सुनी है और जो भूल -चूक होगी माफ़ करियेगा, और ये कथा कैसे की जाती है ?

पण्डित जी बोले, कोई बात नहीं यादव जी, आपको वही करना है जो -जो मैं कहूँगा वो -वो आप करते जाइएगा, बस कुछ ही घंटो में कथा सम्पन्न हो जायेगी ।

यादव ;ठीक है पंडित जी । [यादव और यदवायिन दोनों बड़े प्रसन्न थे ,जो उनके मन की इच्छा पूरी हो रही थी ।

यदवायिन इस समय अपने को दुनियाँ की सबसे ऊँची प्रतिष्ठित व्यक्ति महसूस कर रही थी मन मन फूली समा नहीं रही थी

अब कथा प्रारम्भ होती है। पण्डित जी मंत्र बुदबुदाए फिर बोले ,बेटा!सुपाड़ी यहाँ चढ़ा दो ,[यादव जी मन में सोच रहे थे ,पण्डित जी मुझसे बोले हैं जो मैं कहूँगा वही तुम्हे है ]

यादव पण्डित जी से ;बेटा सुपाड़ी यहाँ चढ़ा दो !

"पण्डित जी को गुस्सा तो बहुत आयी पर शान्त हो गये और खुद ही सुपाड़ी चढ़ा ली "

पण्डित जी ;पान का पत्ता यहाँ चढ़ा दो !

यादव; पान का पत्ता यहाँ चढ़ा दो !

[पण्डित जी को बड़ी तेज गुस्सा आयी और बोले ] मैं तुमसे जो -जो कह रहा हूँ वो तुम करो ,[गुस्से में लाल -लाल आँखे दिखाकर पंडित जी यादव से बोले ]

भी बोल पड़े ;मैं तुमसे जो -जो कह रहा हूँ वो करो !

[पण्डित जी का पारा बढ़ता जा रहा था ]पण्डित जी ने अपनी लाल -लाल आँख दिखाकर ,दाँत भींचकर बोले ,मैं तुमसे शराफ़त से कह रहा हूँ -पान चढ़ाओ ,सुपाड़ी चढ़ाओ ,उसपर जल छिड़को ,फूल चढ़ाओ समझे ।

यादव ने भी लाला -लाल आँखे दिखते हुए पण्डित जी के ऊपर चिल्लाते हुए वही वाक्य दोहराये ।

[ अब तो यादव की खैर नहीं , पण्डित का गुस्सा तो सातवें आसमान पर चढ़ गया ] गुस्से में खड़े हुए और बोले ,यादव की दुम ,गधे ,बेवकूफ, नासमझ ,मंदबुद्धी तू अपने को क्या समझता है ?अपने को पंडित समझ बैठा है और यादव को दो थप्पड़ लगा दिए ।

[यादव के तो कथा का भूत सवार था । यादव को तो यही पता था कि पण्डित जी जो -जो कहेंगे वही करना पड़ेगा चाहे मजबूरी में ही करना पड़े । यादव जी कहाँ कथा सुनने से पीछे हटने वाले थे ]

यादव जी भी पूरे जोश के साथ उठे और वही पूरी बात पण्डित जी की आँखों में आँखे डालकर चिल्लाते हुए कहडाली और अन्त में पूरे जोर से पण्डित के गालों पर हथौड़े जैसा दो हाथ दे डाला ।

पण्डित जी की पूरी खोपड़ी घूम गयी और जब होश आया तो यादव को पटक -पटक क्र बहुत मारा । यादव भी पंडित की पटक -पटक क्र खूब धुनायी की ,अब तो दोनों में पटका की पटकी घमासान युद्ध होने लगा । दोनों जब लड़ते -लड़ते थक गए, शरीर में जैसे जान ही न रह गयी हो तब,

पण्डित जी ने अपनी जान बचते हुए घर की तरफ भागे । यादव ने आवाज लगाई अरे ! पण्डित जी अपना दक्षिणा तो लेते जाइये । अगर ऐसा करेंगे तो नरक में भी हम मुँह दिखाने लायक न रह जाएंगे,दक्षिणा लिए बगैर हम आपको नहीं जाने देंगे ।

पण्डित भागते हुए हरामख़ोर अपनी दक्षिणा अपने पास रख........ ।

"यादव गहरी सांस लेते हुए "अरे डब्बू की अम्मा कथा सुनने में बहुत मेहनत लगती है, हमारा तो पूरा शारीर दर्द हो रहा है ,और इतने शरीफ पण्डित जी की एक बार भी दान -दक्षिणा के लिए नहीं बोले ।

" यदवायिन "कोई बात नहीं जी हमारी मन की इच्छा तो पूरी हो गयी । चलो आज कथा सुन ली ,समझ लो चारों धाम चले गये । लेकिन पण्डित जी तो अपनी दक्षिणा तो ले नहीं गए ।

दक्षिणा पण्डित जी के घर पहुंचनी होती होगी इसलिए न ले गए हो । कितनी मेहनत कथा भी तो सुनाने में लगती है आखिर वो कैसे ले जाते ,शाम को तुम दे आना । ठीक है जी हम दे आएंगे ।

पण्डित ने अपनी पत्त्नी से अपनी सारी आपबीती सुनायी । पंडिताइन तो गुस्से से आग बबूला हो गयी। उन्होंने ठान ली कि मेरे पति की ये हालत कर दी,उन लोगों को छोडूँगी नहीं ।

पण्डिताइन ने मुंगरी [ कपड़ा धुलनें की लकड़ी जैसी ] डंडा तैयार कर यदवायिन का इंतजार कर रही थी ।

सिकहऔले [तब की तरह सीक से बनी हुयी वस्तु ] में अनाज,दान दक्षिणा की चीजें रखकर पण्डित के घर यदवायिन पहुँच गयी । दरवाजे की कुंडी खटखटाते हुये ,पण्डित जी दरवाजा खोलिए आप अपना दक्षिणा नहीं लेकर आए वही देने आयी हूँ !

पण्डिताइन को इसी पल का इंतजार था । उन्होंने दरवाजा खोलते ही मुंगरी से यदवायिन को पीटना शुरू कर दिया और यदवायिन कहाँ पीछे हटने वाली उसने भी पण्डिताइन से मुंगरी छीन कर उतनी ही मारी जितनी मार खायी थी अब तो दोनों में बाल घासीट -घासीट कर,अटका -पटकी कर -कर के गाली गालौज से मारधाड़ होने लगी । [पण्डित जी के उतनी हिम्मत ही नहीं की दोनों को अलग कर सके ] दोनों एक दूसरे से ऐसे लड़ रहीं थी जैसे चन्दन के पेड़ से साँप लपटा हो । अन्त में दोनों की हिम्मत नहीं रह गयी कि और लड़ सकें । पण्डिताइन ने यदवायिन को धक्का देकर भगा दिया ।

घर आकर यादव से बोली :सुनिये जी पता है आपको जीतनी मेहनत कथा सुनने में लगती है उससे ज्यादा मेहनत दक्षिणा देने में लगती है ।

(अम्मा )
Pandit and Yadav's Tale

Saturday, June 25, 2016

अंतर

नौ  वर्षीय साक्षी अपने हाथों  पर ठोड़ी टिकाये सोच की मुद्रा में बैठी थी । वह अभी -अभी अपने पड़ोसी  की बेटी सान्वी  की बर्थडे पार्टी से आई थी । 
               साक्षी के पिता को यह बात अजीब लगी । उसके माता -पिता अपनी एकलौती बेटी को बहुत प्यार करते थे और उसका बहुत ध्यान रखते थे । 
               "क्या तुमने हमारी साक्षी को डाट दिया है ?एनी  ने अपनी पत्त्नी अरु से पूछा । 
"नहीं तो !पर तुम ऐसा क्यों पूछ रहर हो "?उन्होंने पति से पूछा । 
               तो फिर पुरे दिन घर को सर पर उठाकर रखने वाली हमारी उत्साही बिटिया को क्या हो गया ?
मैं  तो किचन में काम कर रही थी और मैंने ध्यान भी नहीं दिया ।पड़ोस  में डॉक्टर साहब के यहाँ  जन्मदिन की पार्टी में जाने के पहले तो वह ठीक थी ,
                "क्या बात है साक्षी ?तुम ऐसे क्यों बैठी हो ?पिता जी ने नरमी से पूछा । साक्षी ने अपनी पिता जी की ओर  देखा ।उसके  चेहरे से स्पष्ट था कि कोई बात उसे परेशान कर  रही  है । 
               साक्षी ने कहा , पिता जी आपको पता है ,सान्वी  को बहुत सारे  तोहफ़े  मिले । बहुत सारी  खिलौने की कारें ,गुड़िया और कपड़े ,एनी को सब समझ में आ गया । 
               साक्षी मुझे अभी -अभी याद आया । क्या तुमने स्कूल में होने वाली गायन प्रतियोगिता के लिए अभ्यास किया ?एक बार मुझे सुनाओ । एक बार मेरे लिए गाओ ना  !उन्होंने उसका ध्यान बताने के लिए विषय बदलने का प्रयास किया । साक्षी ने वह गाना  गाया  जो अपनी माँ से सिखा  था । माँ ने उसे दो तीन बार टोककर  सुर सही करवाया । 
अगले दिन जब शाम को एनी घर आये तो साक्षी उन्हें दरवाजे पर ही मिल गयी । उसने उन्हें वह किताब दिखाई जो उसने गायन प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार के रूप में प्राप्त की थी । वह बेहद उत्साहित थी । एनी ने मुस्कुराकर उसकी ओर देखा और पूछा  "साक्षी , तुम इस किताब के लिए इतनी उत्साहित क्यों हो ,जबकि इसकी कीमत भी कुछ अधिक नहीं है ? 
                     आपको पता है कि निर्णायक महोदय ने कहा  है कि मैं  बड़ी होकर महान गायिका बनूँगी और मेरी बहुत प्रशंसा की ,इसलिए ,[ख़ुशी से समाती  साक्षी ने कहा  ]। 
                    "इसका मतलब यह किताब तुम्हे तुम्हारे हुनर के लिए इनाम के तौर पर मिली है ?"
"मैं  इसे अपने पास सम्हाल कर रखूँगी । पिताजी यह बात तो मैं  बड़ी होकर भी नहीं भूल पाऊँगी !" साक्षी के आँखों में चमक थी । 
                     एनी ने उससे बात करते हुए उसके बालों को प्यार से सहलाते रहे , साक्षी ,क्या अब तुम्हे समझ में आया कि उपहार और इनाम में क्या फ़र्क है ? जो हमसे प्रेम करते हैं , वे हमें सप्रेम उपहार देते हैं । जबकि हम अपने कड़ी मेहनत  और हुनर के बल पर ईनाम पाते  हैं । दोनों से ही हमें प्रसन्नता होती है । लेकिन कड़ी मेहनत से जीती हुयी कोई चीज़ हमें आसानी से मिल जाने वाली चीज़ो की अपेक्षा बहुत कीमती होती है । मुझे उम्मीद है कि अब तुम इनमें अंतर समझ गयी होगी । 
                       साक्षी ने यह जताने के लिए अपना सर हिलाया कि  वह समझ गयी है । उसने अपने तोहफ़े को कसकर गले लगाया और फिर उत्साह से उसे अपने दोस्तों को दिखने दौड़ गई ।  

                                                                                                      ए.कोण्डल राव {चन्दामामा }